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  • By: Sayed Amir
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  • 29.11.2020

Nafil Roze Ki Fazilat

दोस्तों इबादत में जहां तक हम सब फर्ज़ इबादात पर ज़्यादा गौर करते है लेकिन हैं साथ साथ नफिल इबादत पर जैसे नफिल नमाजे नाफिल रोजे पर भी ध्यान देना चाहिए तो इसी तरह आज हम इस टॉपिक पर कुछ नफिल रोजों की फजीलत के बारे में जानेंगे अल्लाह के रसूल सल्ला वाले वसल्लम ने Nafil Roze Ki Fazilat बयान की है उसके बारे में हम इस टॉपिक में बात करेंगे।

सबसे पहले हम बात करेंगे आशूरा के रोजे के बारे में

Ashura ke din ka roza। आशूरा का रोजा

ashura ke roza ki fazilat

Youm e ashura ka roza यानी दसवीं मोहर्रम का रोजा जिसको दसवीं मोहर्रम का रोजा भी कहते हैं  ashura ke roze ki fazilat  अल्लाह के रसूल सल्ला वाले वसल्लम ने हदीस में इस ashura roze ki fazilat फरमाया है ashura roza ki niyat और रखने का तरीका यह है कि नवी मोहर्रम को और दसवीं मोहर्रम को रखा जाए रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आशूरा को रोजा खुद रखा और इसके रखने का लोगों को हुक्म भी दिया है और

Ashura ke roza ki hadees

अल्लाह के रसूल सल्ला वाले वसल्लम ने फरमाया रमजान के रोजे के बाद अगर कोई अफजल रोजा है तो वह मोहर्रम का रोजा है और यह जो बात है जो हदीस है बुखारी और मुस्लिम और अबू दाऊद और तिर्मीजी से साबित है और रसूल अल्लाह ने यह भी फरमाया कि आशूरा का एक रोजा 1 साल पहले का गुनाह मिटा देता है( मुस्लिम शरीफ)

Shawwal ke roze। शव्वाल के रोज़े

दोस्तों नफिल रोजे में Shawwal ke roze ki fazilat 6 रोजों की भी बहुत अहमियत है रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो वाले वसल्लम ने फरमाया जिसने रमजान के रोजे रखे फिर उसके बाद 6 दिन शव्वाल के रोजे रखे तो वह आदमी ऐसा है जैसे कि उसने हमेशा रोजा रखा और दूसरी जगह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलेह वसल्लम ने फरमाया जिसने ईद के बाद 6 रोज़े रखे तो उसने पूरे साल का रोजा रखा (मुस्लिम शरीफ)

Masla बेहतर यह है कि जब जो रोजा रखा जाए तो अलग-अलग दिन रखे जाएं और अगर ईद के बाद लगातार छह दिन एक साथ रख लें तब भी इसमें कोई हर्ज नहीं।

Arfa ka Nafil roza। अरफा का रोजा

अल्लाह के रसूल सल्ला वाले वसल्लम ने फरमाया अरफा का रोजा 1 साल पहले और 1 साल बाद के गुनाह को मिटा देता है (मुस्लिम शरीफ) अरफा यानी नवी जिलहिज्जा का रोजा यानी नवीं जिलहिज्ज को जो रोजा रखा जाता है उसे अरफा का रोजा कहते हैं

हजरत आयशा सिद्दीका रजि अल्लाहू अन्हुमा फरमाती हैं कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलेह वसल्लम अरफा के रोजे को हजारों के बराबर बताते थे मगर हज वालों को जो अरफात में है उसे इस रोसे से मना फ़रमाया है यानी जो हज कर रहा हो उस वक्त उस को इस रोजे को रखने से मना फ़रमाया है (अबू दाऊद)

Shabaan ke roze। शाबान का रोजा

रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया shaban की 15 vee रात आए तो इस रात को कयाम करो कयाम का मतलब जहां पर है की नफिल नमाज पढ़ो और दिन में रोजा रखा करो जाने रात में बयान करो दिन में रोजे रखने का जिक्र आया है अल्लाह ताला सूरज डूबने के बाद से आसमान है दुनिया पर खास ताज अली फरमाते हैं और फरमाते हैं कि कोई बख्शीश चाहने वाला है जिसे मैं रख लूं हर कोई रोजी तलब करने वाला कि मैं उसकी रोजी बना दूं है कोई मुसीबत में गिरफ्तार मैं उसको मुसीबत से निकाल दूं कोई ऐसा है कोई ऐसा है इस वक्त तक फरमाते हैं जब तक की फजर की तुलु हो जाती है मतलब फज्र का वक्त होने तक अल्लाह ताला आसमान यावल पर आकर यह फरियाद करते रहते हैं (इब्ने माजा)

अल्लाह के रसूल सल्ला वाले वसल्लम ने दूसरी हदीस में फरमाया शाबान की 15 वीं रात में अल्लाह ताला तमाम मखलूक की तरफ तजल्ली फरमाता है और सब के गुनाह को बख़्श देता है मगर काफिर और अदावत करने वालों को माफ़ नहीं करता यानी जिन आदमियों में दुनिया की अदावत, यानी दुनिया के किसी मसले को लेकर लड़ाई हो तो उस रात को आने से पहले उन्हें चाहिए कि हर एक दूसरे से मिल जाए और एक दूसरे से सुलह कर ले और हर आदमी एक दूसरे की खता को माफ कर दें ताकि मगफिरत उनको भी मिल सके।

Ayyame baiz ke Nafil roze। अय्यामे बैज़ के रोज़े

Ayyame baiz यानी हर महीने की 13वीं 14वीं 15वीं तारीख को जो रोजा रखा जाता है उसे Ayyame baiz के रोजे कहते हैं रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हर महीने में 3 दिन के रोजे ऐसे हैं जैसे हमेशा का रोजा (बुखारी, मुस्लिम)

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिस आदमी से हो सके हर महीने में तीन रोजे रखे हर रोज 10 गुना मिटाता है और गुना से ऐसा पाकर देता है जिस तरह पानी कपड़े को साफ कर देती (तबरानी) Nafil Roze Ki Fazilat 

हज़रत इब्ने अब्बास रजि अल्लाह ताला अनहु ने फरमाया कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम सफर में और घर में हमेशा ayyame baiz के रोजे रखते थे (निसाई शरीफ़)

Peer aur jumeraat ka roza। सोमवार और जुमेरात का रोजा

रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया पीर यानी दोशंबा और जुम्मे रात को आमाल अल्लाह के सामने पेश किए जाते हैं इसलिए मैं पसंद करता हूं कि मेरा अमल इस वक्त पेश हो जब मैं रोजेदार हूं यानी मैं रोजे से रहूं, और फरमाया इन दोनों दिनों में अल्लाह ताला हर मुसलमान की मगफिरत फरमाता है यानी हर मुसलमान को माफ करता है मगर उन दो आदमियों को जिन्होंने आपस में लड़ाई की हुई है यानी आपस में जुदाई कर ली है इनके बारे में अल्लाह ताला फरिश्तों से कहते है इन्हें छोड़ दो जब तक यह सुलह ना कर ले।

Budh,jumeraat aur jume ke din ka roza

रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो बुध और जेवरात को रोजा रखेगा उसके लिए दोजक से छुटकारा लिख दिया जाएगा और फरमाया जो बुध और जो मेरा तो जमा करो उसे रखेगा अल्लाह ताला उसके लिए जन्नत में कैसा मकान बनेंगे जिसका बाहर का हिस्सा अंदर से दिखाई देगा और अंदर का हिस्सा बाहर से दिखाई देगा।

Masla खुसूसियत के साथ यानी जुम्मा के दिन इनको खास मानकर रोजा रखना मकरुह है, बेहतर यह है कि आगे या पीछे और एक रोजे को मिलाकर रख लें, अकेला रोज़ा रखना मक्रूह है।

nafil roza kab tod sakte hai

Nafil roze kab tod sakte hain

जानिए वह कौन से हालात है जब नफिल रोजे को तोड़ा जा सकता है।

मेहमान की खातिर नफिल रोज़ा तोड़ने की इजाज़त है,जबकि ये भरोसा हो की उसकी कजा बाद में रख लेंगे।

अगर किसी भाई ने दावत दी जो तो शुरू के वक्त में रोजा तोड़ने की इजाज़त है।लेकिन कजा वाजिब है।

औरत को बग़ैर शाैहर की इजाज़त नफिल या मन्नत किस्म के रोजे ना रखे अगर शौहर चाहे तो तोडवा सकता है।लेकिन इसकी भी कजा वाजिब है।

 

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